जो चटोरे रसना पर नियंत्रण नहीं पा सकते ,वे बहुत बड़े इन्द्रीयजयी बनकर नग्नताका समर्थन करके प्रवचन करते हैं -' दोष नग्नता में नहीं ,दृष्टि में होता है । मन शुद्ध होना चाहिये ।'
नेत्र हैं तो नेत्रों का विषय देखना भी है ,जब विषय है तो तदाकार अन्तःकरण में उद्रेक भी होगा । प्रकृतिके विषयों में बद्ध जीव जो रसना पर नियन्त्रण नहीं रख सकते , व्यंजन देखकर लार टपकती रहती है , क्या वे इन्द्रियों ,इन्द्रियों के विषयों और तदाकार अन्तःकरण से निःस्पृह हो सकते हैं ? क्या वे स्थितप्रज्ञ हो चुके हैं ? यदि नहीं तो फिर बहानेबाजी क्यों ?
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