Friday, 30 May 2014

#EnvironmentDay


अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत । तारयेद् वृक्षरोपी च तस्मात् वृक्षांश्च रोपयेत् ॥
तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशयः । परलोगतः स्वर्गं लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् ।।(महाभारत)

भावार्थ--:

हे युधिष्ठिर! वृक्षों का रोपण करने वाला मनुष्य अतीत में जन्मे पूर्वजों, भविष्य में जन्मने वाली संतानों एवं अपने पितृवंश का तारण करता है। इसलिए उसे चाहिए कि पेड़-पौंधे लगाये ।
मनुष्य द्वारा लगाए गये वृक्ष वास्तव में उसके पुत्र होते हैं इस बात में कोई शंका नहीं है । जब उस व्यक्ति का देहावसान होता है तो उसे स्वर्ग एवं अन्य अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ।




पुराणों में पानी के महत्व और उसके संरक्षण के बारे में स्पष्ट व्याख्या की गई है। शिव पर जल चढ़ाने का महत्व भी समुद्र मंथन की कथा से जु़ड़ा है। अग्नि के समान विष पीने के बाद शिव का कंठ एकदम नीला पड़ गया था। विष की ऊष्णता को शांत करके शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए समस्त देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिव पूजा में जल का विशेष महत्व है।

शिव पुराण में तो यहाँ तक कहा गया है कि भगवान शिव ही स्वयं जल हैं...

संजीवनं समस्तस्य जगतः सलिलात्मकम्‌।
भव इत्युच्यते रूपं भवस्य परमात्मनः ॥


अर्थात्‌ जो जल समस्त जगत के प्राणियों में जीवन का संचार करता है वह जल स्वयं उस परमात्मा शिव का रूप है। इसीलिए जल का महत्व समझकर उसकी पूजा करना चाहिए, न कि उसका अपव्यय।

वेदों में जल-सूक्त

...

'वेद’ मानव जाति के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। इनकी भाषा और छन्द भी कल्पनातीत-पुरातन है। वैदिक मन्त्रदृष्टा ऋषियों ने ‘जल’ का किस रूप में अनुभव किया और उसके मन्त्रों का किन-किन कार्यों में ‘विनियोग’ किया – यह जाने बिना हमारा जल सम्बन्धी-ज्ञान अपूर्ण रहेगा।

आपो देवता
वेदों में ‘जल’ को देवता माना गया है। किन्तु उसे जल न कहकर ‘आपः’ या ‘आपो देवता’ कहा गया है।
‘ऋग्वेद’ के पूरे चार सूक्त ‘आपो देवात’ के लिए समर्पित हैं- (1) ऋग्वेद प्रथम मण्डल के तेईसवें सूक्त के मन्त्रदृष्टा ऋषि मेघातिथि काण्व हैं।

मन्त्र
(245) अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्।। पृञ्चतीर्मधुना पयः।।16।।

यज्ञ की इच्छा करने वालों के सहायक मधुर रस जल-प्रवाह, माताओं के सदृश पुष्टिप्रद हैं। वे दुग्ध को पुष्ट करते हुए यज्ञ-मार्ग से गमन करते हैं।

(246) अमूया उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह।।
ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्।।17।।


जो ये जल सूर्य में (सू्र्य किरणों में) समाहित हैं। अथवा जिन (जलों) के साथ सूर्य का सान्नध्य है, ऐसे ये पवित्र जल हमारे ‘यज्ञ’ को उपलब्ध हों।

(247) अपो देवीरूप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः।।
सिन्धुभ्यः कर्त्व हविः।।18।।


हमारी गायें जिस जल का सेवन करती हैं, उल जलों का हम स्तुतिगान करते हैं। अन्तरिक्ष एवं भूमि पर प्रवहमान उन जलों के लिए हम हवि अर्पित करते हैं।