Monday, 15 October 2018

Feminism

जो चटोरे रसना पर नियंत्रण नहीं पा सकते ,वे बहुत बड़े इन्द्रीयजयी बनकर नग्नताका समर्थन करके प्रवचन करते हैं -' दोष नग्नता में नहीं ,दृष्टि में होता है । मन शुद्ध होना चाहिये ।'

नेत्र हैं तो नेत्रों का विषय देखना भी है ,जब विषय है तो तदाकार अन्तःकरण में उद्रेक भी होगा । प्रकृतिके विषयों में बद्ध जीव जो रसना पर नियन्त्रण नहीं रख सकते , व्यंजन देखकर लार टपकती रहती है , क्या वे इन्द्रियों ,इन्द्रियों के विषयों और तदाकार अन्तःकरण से निःस्पृह हो सकते हैं ? क्या वे स्थितप्रज्ञ हो चुके हैं ? यदि नहीं तो फिर बहानेबाजी क्यों ?

Monday, 1 October 2018

आर्यसमाजियों की पाखंड खोल

फेसबुक नेटवर्क में कुछ निकृष्ट समाजियों द्वारा पुराणो का बहुत अभद्र भाषा में द्वेषपूर्ण विरोध किया जा रहा है, जो की अत्यंत निंदनीय है। हिंदूसमाज में अपनी आस्थाओें के प्रति शंका के अनगिनत बीज आर्यसमाज ने बोये, प्राण-दायिनी जल का रूप धर कर, हिंदूसमाज रूपी वृक्ष की जड़ तक पहुँचकर, उसे सींचने के बहाने, धीरे-धीरे उन्हीं जड़ों को चाट गये।

ये लोग स्वमं तो संस्कारविहीन हो चुके है , औरो को भी पथभ्रष्ट करने में लगे हुए है ! सभी सनातनी स्वजनों से निवेदन है कि फेसबुक और व्हाट्सएप्प के किसी ग्रुप की पोस्ट शेयर करने से पहले उसकी अपनी बुद्धि और विवेक से शेयर करे ! नीचे लिखी हुई पंक्तियों को कॉपी करके सभी whatsgroup में भेज देवे , ताकि जो सनातनी इन धूर्त दयानंदी चेलो की ज

आर्यसमाजी धूर्त
जिंदा बाप कोई ना पूजे,मरे बाद पूजवाया ।
मुठ्ठी भर चावल लेकर,कौए को बाप बनाया ।।
जिन्दा हो या ना हो चाहे , सदा बाप पुजवाया।
मुठ्ठी भर चावल देकर , कौए तक को खिलाया ।।
आर्यसमाजी धूर्त

<Font color = red > डित के खाने से पितर कैसे तृप्त हो गये ?

सनातनी वीर :

जैसे पंडित के खाने पर तुम अतृप्त हो गये !

।। जय श्री राम ।।